Wednesday, April 13, 2016

हिन्दी में ग़ज़ल की औसत शक़्ल? +रमेशराज



                 रमेशराज
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हिन्दी में ग़ज़ल की औसत शक़्ल?

+रमेशराज

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ग़ज़ल के ग़ज़लपन को विभिन्न दोषों के आघात से बचाने के लिये डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल अपनी सम्पादित पुस्तक हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लेंकी भूमिका में लिखते हैं कि-‘‘बात ध्यान देने की है कि क़ाफिये [तुक] में अधिक बल स्वरों की समानता पर दिया गया है। जैसे-‘बदनका दनऔर चमनका मनसमान स्वर है, जबकि दिनऔर गिनउससे भिन्न हो गये। इसी प्रकार जलना’, ‘मलना’, ‘ढलनाएक समान क़ाफिये हो सकते हैं, पर इनके साथ हिलना’, ‘मिलना’, का प्रयोग वर्जित है। कुछ अन्य तुकों पर भी दृष्टि डालें तो आकाशका क़ाफिया विश्वासनहीं हो सकता, क्योंकि और की ध्वनियाँ भिन्न हैं। आई’, ‘खाई’, के साथ परछाईं’, ‘साईंया राखके साथ आगऔर नागअथवा शाम’, ‘नाम’, ‘कामके साथ आन’, ‘वाण’, ‘प्राणतथा हवाके साथ धुआँक़ाफिया का प्रयोग निषिद्ध  है।’’
   वे आगे लिखते हैं कि-‘‘यदि मतले में जलनाका क़ाफिया ऐसासे बाँध गया है तो वह अन्त तक की पेरवी करेगा। यदि मतले में जलनाका क़ाफिया गलनाबाँध दिया है तो इसी की पाबंदी पर छलना’, ‘ढलना’, ‘पलनाआदि का प्रयोग करना होगा।’’
   हिन्दी ग़ज़ल के पितामह दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों में आये दोषों पर वे टिप्पणी देते हैं कि-‘‘हो गयी है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए’’ नामक ग़ज़ल में पिघलनी’ ‘निकलनीका क़ाफिया हिलनीतुक से मिलाने का प्रयोग उचित नहीं है। एक अन्य ग़ज़ल में दुष्यंत कुमार ने नारे’, ‘तारेके साथ पतवारें’, ‘तलवारें’, ‘दीवारें’, क़ाफियों का प्रयोग किया है। इसमें अनुनासिकता के कारण स्वर की भिन्नता हो गयी है, अतः इन क़ाफियों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।’’
   हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लों को प्रस्तुत करने से पहले ग़ज़ल के शास्त्रीय पक्ष पर की गयी यह चर्चा इसलिए सार्थक है क्योंकि ऐसे ही नियमों-उपनियमों के द्वारा ग़ज़ल का ग़ज़लपन तय होता है। ग़ज़ल में रदीफ़-क़ाफियों की शुद्ध  व्यवस्था का प्रावधान ग़ज़ल की जान होता है। लेकिन डॉ. गिरिराज शरण अग्रवाल की इन बातों की सार्थकता का तब क्या औचित्य रह जाता है, जब वे इसी पुस्तक की पृ. संख्या-59 पर अपनी एक ग़ज़ल में आहों’,‘निगाहोंकी तुक बाँहोंसे मिलाते हैं और आहोंक़ाफिए को इस ग़ज़ल के अगले शेर  की निगाहोंसे एक अन्य शेर की निगाहोंको अड़ाते हैं। इन्ही क़ाफियों के क्रम में वे गुनाहों और पनाहोंक़ाफिये भी लाते हैं। ये ग़ज़ल की व्याख्याओं, व्यवस्थाओं और सृजन के बीच कैसे नाते हैं, जो स्वराघात, स्वरापात और अनुनासिक स्वर-भिन्न्ता के बावजूद हिन्दीग़ज़ल बन जाते हैं।
   हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लें कितनी [ श्रेष्ठ ही नहीं ] सर्वश्रेष्ठ हैं, आइये इसका भी जायजा लें-
   श्री आत्मप्रकाश शुक्ल पृ. 25 पर शयन’, ‘नयन’, ‘हवनके बीच तीन बार मनक़ाफिया लाकर अध्ययनकरते हैं और इस प्रकार मनमें यनकी तुकावृत्ति के माध्यम से ग़ज़ल के भीतर हिन्दीग़ज़ल का स्वरालोक भरते हैं।
   डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल की ही तरह हिन्दीग़ज़ल के महान उपदेशक, विवेचनकर्त्ता , डॉ. उर्मिलेश मरता नहीं तो क्या करताकी विवशता लादे हुए इसी संग्रह के पृ. 30 पर मतला के दरबारमें हारकर अंधियारका त्यौहारमनाते हुए, हिन्दीग़ज़ल का ऐसा उपहारदेते हैं, जिसका सत्कारतीन बार हारके रूप में रदीफ की तरह होता है। कुल मिलाकर यह काफ़ियों का अनूठा विस्तारग़ज़ल की आँख भिगोता है।
   हिन्दी ग़ज़ल-विद्यालय के हिन्दी प्रवक्ता डॉ. कुँअर बेचैन की ग़ज़ल के नैन वैसे तो कथ्य की विलक्षणता को संकेतों में कहने में बेहद माहिर हैं, लेकिन पृ. 47 पर उनकी ग़ज़ल के क़ाफिये का श्रवण बना स्वर’, ‘काँवरके साथ सिर्फ वरहै, तो भले ही कुछ अन्तरसे ही सही, दशरथ बने स्वराघात के मंतरसे अपने सरको खून से तरकरायेगा। हिन्दीग़ज़ल में क़ाफियों का जल-संचय करते इस बेचारे श्रवण को कौन बचायेगा?
   श्री ओंकार गुलशन की ग़ज़ल की कहन में नवीनपन है किन्तु पृ. 38 पर मतला में नामसे बदनामकी तुक क़ाफिये को ही गुमनामकर देती है। आगे इसमें राम’, ‘आरामकरते हुए घनश्याम’-से बाँसुरी बजाते हैं। हिन्दीग़ज़ल में क्या यही शुद्ध क़ाफिये कहलाते हैं?
   हिन्दीग़ज़ल की रोशनी के हस्ताक्षर, मान्यवर जहीर कुरैशी इस पुस्तक के पृ. 78 पर अपनी ग़ज़ल के मतला के अन्जानशहर में क़ाफिये की शुद्धपहचानकरने में इतने परेशानहैं कि शमशानतक जाते हैं और वहां अपनी दूसरी ग़ज़ल में जहीरकी तुक हीरसे मिलाते हैं और पृ. 62 पर कबीरकहलाते हैं।
   श्री महेन्द्र भटनागर चुराईकी तुक छिपाईसे मिलाने के बाद अगर आगे की तुकों में अपना’ ‘सपनालायें और ऐसी ग़ज़लें सर्वश्रेष्ठ न कहलायें, ऐसा कैसे हो सकता है, ऐसी ग़ज़लों की तुकें तो हिन्दीग़ज़लों की धरोहरहैं लेकिन डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल के आसरे परहैं। इसलिये हिन्दी ग़ज़ल कहने की इस होड़में श्री विनोद तिवारीजी पृ. 157 पर जोड़की तुक यदि दौड़ से मिलायें तो हम क्यों खेद जताएँ। हम ठहरे तेवरी की जेवरी बँटने वाले तेवरीकार, हमें क्या अधिकार जो काका हाथरसी की इसी पुस्तक में छपी हज्लों को हिन्दीग़ज़ल न बताएँ।
   हिन्दी में ग़ज़ल की शक़्ल आजकल है ही ऐसी कि किसी से मतला अर्थात् सिर ग़ायब है तो कहीं तुकें सिसक रही हैं। कहीं छंद से लय का मकरन्द लापता है तो कहीं ग़ज़ल के नाम पर कोरी गीतात्मकता है। हिन्दी के ग़ज़लकार हैं कि ग़ज़ल के ग़ज़लपन से मुक्ति पाकर भी ग़ज़ल-ग़ज़ल चीख रहे हैं। कुछ मिलाकर ग़ज़ल के नाम पर में उत्पात ही उत्पात दीख रहे हैं।
   ‘बराबरहिन्दी पाक्षिक के मई-2002 अंक में श्री प्रदीप दुबे दीपकी पृ. 11 पर 6 ग़ज़लें प्रकाशित हैं। वे अपनी पहली ग़ज़ल के मतला में खंजरकी तुक मंतरसे बाँधते  हैं और आगे की तुकें अस्थिपंजरऔर बंजरलाते हैं। तीसरी ग़ज़ल में वे भारीऔर हितकारीकी तुक उजियारी’, ‘तैयारी’, ‘यारीसे मिलाते हैं। यह सब किसी हद तक झेला जा सकता है। लेकिन ग़ज़ल संख्या चार में पहरेकी तुक सवेरेऔर फिर चेहरेके साथ-साथ गहरेऔर मेरेसे मिलती है तो ऊब पैदा होती है, खूब पैदा होती है। ग़ज़ल में सही तुकों का अभाव भले ही घाव दे, मगर क्या किया जा सकता है? हिन्दी में ग़ज़ल की औसत यही शक़्ल है।
अतः ऊबते हुए ही सही, प्रदीप दुवे दीपकी ग़ज़ल संख्या-6 का भी अवलोकन करें- इसके मतला में गुलसे पुलकी तुक बड़ी खूबसूरत तरीके से मिलायी गयी है, लेकिन इसके बाद की तुकें दिलऔर बादलकोई हलदेने के बजाय स्वराघात की उलझनें ही उलझन पैदा करती हैं, ग़ज़ल में मौत का डर भरती हैं।
   ग़ज़ल की हत्या कर, ग़ज़ल को प्राणवान् बनाने के महान प्रयास में हिन्दी में ग़ज़लकार किस प्रकार जुटे हुए हैं, इसके लिये कुछ प्रमाण चर्चित कवि अशोक अंजुम द्वारा सम्पादित नई सदी के प्रतिनिधि ग़ज़लकारनामक पुस्तक से भी प्रस्तुत हैं-
   हिन्दी ग़ज़ल के महाज्ञाता, चन्द्रसेन विराट पृ.51 पर अपनी दूसरी ग़ज़ल के मतला के क़ाफिये में काफी विकलरहते हुए बड़ी ही सजल’ ‘ग़ज़ललिखते हैं और इस ग़ज़ल में सरल’, ‘विरलबार-बार दिखते हैं। स्वर का बदलना सजलऔर ग़ज़लके बीच है या सरल’, ‘तरलऔर विरलके बीच या विकलऔर धवलके बीच? विराटजी की यह ग़ज़ल भले ही विमलदिखे, किन्तु इसका योगपफल’, ‘विफलही है।
   श्री शिवओम अम्बरहिन्दीग़ज़ल के स्वर्णाक्षर हैं। उनकी ग़ज़ल की साधना तो नीरजनाही नहीं आराधना है लेकिन इस पुस्तक के पृ. 131 पर प्रकाशित ग़ज़ल की तुकों के बीच यह कैसी सम्भावनाहै, जिसमें स्वराघात देने वाली तुक प्रस्तावनाहै, ‘आराधना की तुक आराधनाहै।
   डॉ. रामसनेहीलाल शर्मा यायावरहिन्दी ग़ज़ल के एक कद्दावर फनकार हैं। उक्त संग्रह के पृ. 116 पर उनकी दूसरी ग़ज़ल के क़ाफिये अगर दो बार खबरबनकर मुखरहोते हैं तो चार बार सोचकर’, ‘झूमकर’, ‘भागकरछोड़कर’- अर्थात्, केवल करमें मिटकर इतना अवसर ही नहीं देते कि स्वराघात से बचा जा सके और इन्हें शुद्ध क़ाफिया कहा जा सके।
   आभा पूर्वे दोहों में ग़ज़ल कहती हैं। पृ. 25 पर छपी उनकी दोहाग़ज़ल की शक़ल यह है कि प्राणकी तुक वरदानही नहीं, तीन बार मानभी है। यहाँ भी स्वराघात की मौजूदगी है।
   ग़ज़ल की कहन का फन जिन ग़ज़लकारों को ख्याति के चरम तक ले गया है, ऐसे ख्याति प्राप्त ग़ज़लकार भी हिन्दीग़ज़ल में चमत्कार दिखला रहे हैं।
   प्रो. शहरयाह की ख्याति, खुशबू की भांति विश्व के दरवाजों पर दस्तक दे चुकी है। कई अकादमियों के पुरस्कारों से उनकी शायरी सजी है। वे पृ. 128 पर अपनी पहली ग़ज़ल में समझूंगाकी तुक रक्खूंगा’, ‘देखूंगा’, ‘लिक्खूंगाके रूप में मिलाते हैं और उसमें दो बार बदलूंगाभी लाते हैं, तो खूंगासे ग़ज़ल की पूरी तस्वीर हिलती है और गिरकर बेनूर हो जाती है। चकनाचूर हो जाती है। संयुक्त रदीफ क़ाफियों का यह प्रयोग, काफियों का भंग-योग बन जाता है।
   इसी संग्रह के पृ. 125 पर विज्ञानव्रत की ग़ज़ल का रथ स्वराघात की कीचड़ इतना लतपथहो जाता है कि वह ग़ज़ल से खोये समांत [ रदीफ ] को चीख-चीख कर सहायता के लिये बुलाता है। धीरे-धीरे कीचड़ में पूरा का पूरा रथ डूब जाता है। ग़ज़ल के क़ाफियों का पता करने पर केलाहाथ लगता है जो था’ ‘था’ ‘कहताहुआ, रदीफ के गायब हो जाने की समस्या पर बार-बार झगड़ाकरता है। पता’ ‘केला’, ‘था’, ‘था’, कहता तुकांतों के बीच यह भी पता नहीं चल पाता है कि इस ग़ज़ल में रदीफ़ या क़ाफियों की व्यवस्था क्या है? हिन्दी ग़ज़ल में ग़ज़ल की यह अवस्था क्या है?
   श्री तुफैल चतुर्वेदी इसी संग्रह के पृ. 86 पर पलकी तुक घायललाने के बाद कोयललाते हैं। यारकी तुक यारसे ही निभाते हैं। उनके ये क़ाफिये स्वर के आधार पर क्या बदलाव लाते हैं?
   श्री निदा फाजली वैसे तो ग़ज़लें बहुत भलीभांति कहते हैं लेकिन मतला के क़ाफिये जीवनऔर उलझनयदि बन्धनके साथ [इस संग्रह के पृ.94 पर] ईंधनबन जायें तो इसका धनकाफ़िया होकर भी रदीफ-सा लगेगा और स्वर पर आघात जगेगा।
   चर्चित प्रतिष्ठित कवि बशीर बद्र, काबिले कद्र हैं। उनकी प्रभा हिन्दी की हर सभा में छटा बिखेरती है। ग़ज़ल में विलक्षण प्रयोग के योग उनके साथ हैं। किन्तु पृ. 68 पर प्रकाशित उनकी दूसरी ग़ज़ल का मतला होसे खोकी तुक मिलने के बाद दो बार फिर हो’, ‘होचिल्लाता है और अन्त में फिर खोमें खो जाता है। यह ग़ज़ल का हिन्दीग़ज़ल से कैसा नाता है?
   श्री बेकल उत्साही इसी पुस्तक की पृ. सं. 69 पर विराजमान हैं। उनकी ग़ज़लों के क़ाफिये मौलिक और बेमिसाल हैं, जिनमें विलक्षण प्रयोगों के कमाल हैं। लेकिन यहाँ भी सवाल हैं-उनकी दूसरी ग़ज़ल के दस शेरों की चिट्ठियाँचार बार लियाँ’ ‘लियाँकी ध्वनि के साथ रस्सियाँबटती हैं और वे एक दूसरे के क़ाफियापन को उलटती-पुलटती हैं, अन्ततः एक रदीफ की तरह सिमटती हैं। ऐसा क्यों? उत्तर यों-
हिन्दी में ग़ज़ल के नियमों से छूट लेने की जो लूट मची हुई है, उससे ग़ज़ल का ग़ज़लपन नष्ट हो रहा है। ग़ज़लकार को जहाँ सजग रहना चाहिए, वहीं सो रहा है।
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ-202001

मो.-9634551630  

Monday, April 11, 2016

हिन्दी ग़ज़लः सवाल सार्थकता का? +रमेशराज

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हिन्दी ग़ज़लः सवाल सार्थकता का?

+रमेशराज
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   ग़ज़ल अपनी सारी शर्तों, ;कथ्य अर्थात् आत्मरूप-
प्रणयात्मकता तथा शिल्परूप- बह्र, मतला, मक्ता, अन्त्यानुप्रासिक व्यवस्था में रदीफ काफिये, अन्य तकनीकी पक्ष जैसे शेरों की निश्चित संख्या, हर शेर का कथ्य अपने आप में पूर्णता ग्रहण किए हुए आदि-आदि के साथ ही लिखी जानी चाहिए। चाहे उसका सृजन हिन्दी, पंजाबी, गुजराती, बंगाली या उर्दू में हो, लेकिन पुकारी या कही जानी ग़ज़ल ही चाहिए। ग़ज़ल अपनी सारी शर्तों को पूर्ण किए बिना अपने अस्तित्व या चरित्र की रक्षा कैसे कर पायेगी या किस तरह ग़ज़ल कहलाएगी? बहस का मुख्य बिन्दु यही होना चाहिए। किसी वस्तु को परम्परा से काटकर उसका मूल्यांकन उसी परम्परा में करना अतर्कसंगत ही माना जाना चाहिए। होली के अवसर पर दीप जलाकर, लक्ष्मी का पूजन एवं पटाखे छोड़कर क्या हम होली की परम्परा को जीवित रख सकते हैं? या ऐसी परम्परा को होलीनाम से पुकार सकते हैं? जनसमूह तो नेताओं की सभाओं में भी होता है। वहाँ खाने-पीने से लेकर तरह-तरह के मनोरंजन की दुकानें भी लगाई जाती हैं। क्या इस प्रकार के एक राजनीति मंच को किसी मेले के रूप में पहचाना जा सकता है? हर स्थिति में एक विवेकशील मनुष्य इसका उत्तर में ही देगा। अपनी परम्परा, अपनी शर्तों से कटकर कोई वस्तु उसी परम्परा के साथ जीवित या सार्थक रह ही नहीं सकती है।
   लेकिन ग़ज़ल के साथ यह कमाल या चमत्कार कम से कम हिन्दी में तो हो ही रहा है। प्रसंगवशके समकालीन हिन्दी ग़ज़ल विशेषांक फर.-1994’ में डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी का आलेख आधुनिक हिन्दी ग़ज़लः रचना और विचारग़ज़ल को ग़ज़ल की परम्परा या शर्तों से काटकर हिन्दी में ग़ज़ल कहलवाने अथवा मनवाने का एक ऐसा मायाजाल है जो किसी सार्थक हल की ओर पहुँचाता तो कम है, भटकाता ज्यादा है। डॉ. सत्यप्रेमी अपने मत के पक्ष में विभिन्न विद्वानों के अभिमत प्रस्तुत करते हुए यह कहकर भले ही आश्वस्त हो लें कि ‘‘ग़ज़ल की विषयवस्तु को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं और यह मतभेद ही ग़ज़ल के उर्दू ग़ज़ल और हिन्दी ग़ज़ल नामकरण की पृष्ठभूमि भी निर्मित करता है’’, लेकिन यह आश्वस्ति दीर्घकालिक या स्थायी इसलिए नहीं है क्योंकि उन्हीं के अनुसार विद्वानों में मतभेद हैं और हमारे हिसाब से आगे भी इसलिए रहेंगे क्योंकि इसका हमारे पास न तो कोई शास्त्रीय हल है और न हम किसी शास्त्रीय तरीके से इस मुद्दे को हल करना चाहते हैं। नीम को बबूल या बबूल को नीम मनवाने की यह जोर-जबरदस्ती मतभेदों को नहीं तो किसको जन्म देगी?
   उक्त आलेख पर अगर हम [ विभिन्न विद्वानों के अभिमतों को डॉ. सत्यप्रेमी के मतों से मिलाते हुए ] क्रमशः अध्ययन, चिन्तन, मनन करें तो जिन मतभेदों की काली छाया से डॉ. सत्यप्रेमी शुरू से ही आतंकित होते हैं, वह काली छाया इस आलेख के अन्त में भी ज्यों की त्यों मौजूद रहती है। डॉ. सत्यप्रेमी फरमाते हैं कि-‘‘एस.एन. अहमद फारुख ने अपने लेख हिन्दी उर्दू ग़ज़ल का स्वर [ युगधर्म, दीपावली विशेषांक-1978 ] में लिखा है कि ‘‘ग़ज़ल की यह विधा जब हिन्दी साहित्य में प्रवेश करती है.... तो इसके एक-एक शब्द से देशभक्ति, इन्सानी दर्द और कौमी बेदारी राष्ट्रीय [ चेतना ] टपकती-सी प्रतीत होती है।’’
अब डॉ. सत्यप्रेमी और एस.एन. अहमद फारुख साहब को यह तो कोई भाषा वैज्ञानिक ही समझा सकता है कि उर्दू और हिन्दी दो अलग-अलग भाषाएँ नहीं हैं, बल्कि उर्दू, हिन्दी की एक बोलीमात्र या हिन्दी ही है और इस भाषा वैज्ञानिक सत्य या वास्तविकता के कारण हिन्दी और उर्दू की यह सारी बहस ही अपने-आप बेमानी या खारिज हो जाती है।
बात आती है-ग़ज़ल के हिन्दी में इस तरह प्रवेश करने या कराने की, तो फारुख साहब से यह तो पूछा ही जा सकता है कि क्या वे ग़ज़ल की तर्ज पर ही हज़्ल को भी इसी तरह, हिन्दी में प्रवेश दिला सकते हैं, जिस तरह उन्होंने ग़ज़ल को हिन्दी में साकी, शराब मयखाने से मुक्ति दिलायी है।
खैर... इस तरह हज़्ल भी हिन्दी में आकर अपनी अश्लीलता से कुछ तो मुक्ति पायेगी। पर सोचना यह है कि ऐसे में हज़्ल कैसे हज़्ल कहलायेगी? हिन्दी और उर्दू के छद्म भेद पर टिका यह चिन्तन, निष्कर्ष के किसी पड़ाव तक इसलिये नहीं ले जा सकता है क्योंकि इसकी सारी की सारी प्रक्रिया अपाहिज होने के साथ-साथ जिधर मंजिल है या होनी चाहिए, ठीक उसके विपरीत दिशा में हाथ-पैर पटक रही है।
   इसी आलेख में डॉ. सत्यप्रेमी, डॉ. जानकी प्रसाद के विचारों से इस तथ्य की पुष्टि करने की कोशिश करते हैं कि ‘‘वर्तमान समय में उर्दू भाषा का व्यवहार करने वाली जाति अखण्ड भारत का हिस्सा बन गयी है। ऐसी स्थिति में उर्दू भाषा के शब्द भी हिन्दी भाषा में अपनी मूल प्रकृति खोकर प्रयुक्त होते हैं तो यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। ग़ज़ल को हिन्दी कविता में उर्दू फारसी कविता की समीपता तथा भारतीय और इस्लाम संस्कृतियों के साहचर्य के संदर्भ में ग्रहण किया है। ग़ज़ल का हिन्दी में आगमन, एक साहित्यिक घटना ही नहीं है, यह एक सांस्कृतिक घटना भी है।’’
   डॉ. सत्यप्रेमी के अनुसार जब स्थिति यह है कि यह सांस्कृतिक मेलमिलाप अपने स्वाभाविक प्रक्रिया को अपना रहा है, भाषा की दृष्टि से उर्दू और हिन्दी अभिन्न बनने की भरसक कोशिश कर रहे हैं, तब ग़ज़ल की दृष्टि से हिन्दी और उर्दू के भेद और क्यों गहराते जा रहे हैं? स्वाभाविकता में पैदा की गयी यह अस्वाभाविकता मतभेदों को नहीं तो किसको जन्म देगी। ग़ज़ल विभिन्न सांस्कृतिक एवं भाषिक मेलमिलाप जैसे अरबी-फारसी, उर्दू आदि के बीच ग़ज़ल ही रही लेकिन हिन्दी के साथ तालमेल बिठाने में उसे ऐसी दिक्कतों या झगड़ों का सामना क्यों करना पड़ रहा है जैसी कि दिक्कतें या झगड़े धर्म के नाम पर सम्प्रदाय पैदा कर देते हैं या कर रहे हैं। ऐसे मतभेदों को स्वीकारते हुए भी, इन्हीं मतभेदों को ऐसे आलेखों के माध्यम से और गहराते जाना कौन-सी समझदारी है?      
जब सारा का सारा विवेचन कुतर्कों और अवैज्ञानिक सूझबूझ के सहारे चल रहा है तो डॉ. सत्यप्रेमी का इस प्रकार खीज उठना भी समझ से परे है कि ‘‘ इतना सब कुछ स्पष्ट हो जाने के पश्चात भी हिन्दी के स्वनामध्न्य आलोचक-समीक्षक विद्वान हिन्दी ग़ज़ल को आधुनिक युग की एक सशक्त विधा के रूप में स्वीकार नहीं कर पाते हैं और हिन्दी ग़ज़ल की पर आये दिन प्रहार करते ही रहते हैं।’’
   जिसे डॉ. सत्यप्रेमी इतना कुछ स्पष्टकह रहे हैं उसमें थोड़ा-सा ही कुछस्पष्ट हो जाता तो उन्हें यह सब कुछन कहना पड़ता और इस विरोध को अपने कुतर्कों के सहारे पूरी की पूरी भारतीय आलोचना/ समीक्षा के माथे पर कलंक के टीके की तरह नहीं मढ़ना पढ़ता? चाहे वे इस बात की लाख दुहाई दें कि-‘‘वास्तविक मूल्यांकन के साहसिक तथा यथार्थपरक दृष्टिकोण के अभाव में प्रत्येक सही कृति समीक्षकों के दायरे में कविता के सामान्य महत्व से भी वंचित रही। कबीर, भारतेन्दु, निराला, मुक्तिवोध, राजकमल चैध्री, धूमिल, दुष्यंत कुमार, अनिल कुमार तथा आज की कविता-अकविता के साथ यह दुर्घटना घटी।’’
   इन सब बातों का उत्तर सिर्फ यह है कि यदि रचनाओं का धरातल ठोस, वास्तविक, शास्त्रीय और सत्योन्मुखी है तो आज नहीं तो कल उनका जादू सर पर चढ़कर बोलेगा ही। उपरोक्त नाम घने झंझाबातों के बावजूद आज भी प्रासंगिक हैं। जिन लचर और कमजोर रचनाओं ने जन-कविता का कभी भी गौरव पाया है तो आगे चलकर खोया भी है। इसलिये चिंता का विषय यह नहीं। चिन्ता तो यह है कि जब नासमझीसमझदारी का रूप ग्रहण कर ले, ‘तर्कहीनतातर्क बनने का प्रयास करे तो क्या किया जाये? जब तर्क के नाम पर ऐसे कुतर्क देकर किसी सार्थक मूल्यांकन की दुहाई दी जाये कि-‘‘पूर्व निर्धारित नियमों एवं उपनियमों को टटोलने से कविता की सच्चाई नहीं पायी जा सकती?’’
   डॉ. सत्यप्रेमी ऐसा कहकर क्या संकेत देना चाहते हैं? सच पूछा जाये तो उनके या उन जैसे हिन्दी ग़ज़ल के पक्षधरों की कलई इसी बिन्दु पर आकर घुल जाती है। दरअसल ऐसे हिन्दीग़ज़ल के पक्षधर या विद्वान ग़ज़ल के नाम पर पाठकों को ऐसा बूड़ा-कचरा परोसना चाहते हैं, जिसे हिन्दी साहित्यकारों को आँख मूँदकर उनके गले उतारा जा सके। इसके पीछे छुपा स्वार्थ भानु प्रताप सिंह ‘भानु’ के शब्दों से पूरी तरह खुलकर सामने आ जाता है कि-‘‘उर्दू ग़ज़ल का ज्यों का त्यों अनुकरण हिन्दी कवियों को सफलता नहीं दे सकेगा। उर्दूग़ज़ल से भिन्नता होनी ही चाहिए अन्यथा हिन्दी और उर्दू ग़ज़ल में एक रूप होने से हिन्दीग़ज़ल का अस्तित्व पृथक् न रहेगा। दोनों भाषाओं की ग़ज़लों में एक विभाजन रेखा होना अत्यावश्यक है।’’
   डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी, श्री एस.एन. अहमद फारुख और श्री भानुप्रताप सिंह भानुके इन निष्कर्षों के आधार पर आसानी से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ग़ज़ल के नाम पर एक बहुत बड़ी खाई हिन्दी और उर्दू के बीच खोदी जानी आवश्यक ही नहीं, परमावश्यक है। ऐसा करने पर ही हिन्दी ग़ज़ल का अस्तित्व कायम किया जा सकता है। हिन्दी में ग़ज़ल के अस्तित्व की रक्षा के लिये भले ही ग़ज़ल के चरित्र अर्थात आत्मा और शरीर [ नियम-उपनियम ] अर्थात् शिल्प की हत्या करनी पड़े, हिन्दी के ऐसे विद्वान ऐसा करने में चूकेंगे नहीं। ग़ज़ल की हत्या कर ग़ज़ल को प्राणवान घोषित करने की यह प्रक्रिया कितनी सार्थक और सारगर्भित है? इसका अनुमान बड़ी ही सहजता से लगाया जा सकता है। सच तो ये है कि हिन्दी ग़ज़ल के पक्ष में डॉ. सत्यप्रेमी का उक्त आलेख निर्जीव और आधारहीन सिद्धान्तों और तर्कों के सहारे खड़ा होने का प्रयास करता है। और यही वजह है कि अपनी लाख कोशिशों के बावजूद औंधे मुँह गिर पड़ता है। डॉ. सत्यप्रेमी लिखते हैं कि-‘‘ समकालीन हिन्दी ग़ज़ल पारम्परिक ग़ज़ल की काव्य रूढि़यों से मुक्त होने का प्रयास भी है तथा नये शिल्प एवं विषय का विकास भी इसमें परिलक्षित होता है।’’
   डॉ. सत्यप्रेमी ने अगर थोड़े से तर्कों का भी सहारा लिया होता तो सबसे पहले परम्परागत ग़ज़ल की काव्य-रूढि़यों को बतलाते और इसके उपरांत हिंदी ग़ज़ल के उत्तरोत्तर विकास को समझाते। इस प्रकार परंपरागत ग़ज़ल की काव्य-रूढि़यों से मुक्ति पाने के प्रयास को पाठक आसानी से समझ लेते। लेकिन उन्होंने यह सब कुछ न समझाते हुए इन सवालों से पलायन करने में ही अपने समझदारी का परिचय दिया है। यह पलायन की प्रवृत्ति उन पर किस तरह हावी है इसका एक उदाहरण और प्रस्तुत है-
   डॉ. पुरुषोत्तम सत्यप्रेमी फरमाते हैं-‘‘ हिन्दी ग़ज़ल के नामाकरण को लेकर भी इन दिनों विवाद की स्थिति निर्मित हो गयी है। डॉ. धनंजय वर्मा और डॉ. राजेन्द्र कुमार ने धर्मयुग ,16 नवम्बर 1980 में हिन्दी ग़ज़ल की सकारात्मक दृष्टि को कुंठित किया है और उर्दू और हिन्दी की भाषायी मामले को रेखांकित किया है। डॉ. राजेन्द्र कुमार ने हिन्दी ग़ज़ल की सार्थकता एवं औचित्य को बड़ी सूक्ष्म दृष्टि से प्रतिपादित किया है।’’
यहाँ गौरतलब बात यह है कि डॉ. सत्यप्रेमी ने डॉ. वर्मा की बात को बिना कोई तर्क दिये हवा में उड़ाने की कोशिश की है। अगर डॉ. वर्मा को हिन्दी ग़ज़ल में साम्प्रदायिक बू महसूस हुई और उन्होंने हिन्दीग़ज़ल की सकारात्मक दृष्टि को कुंठित किया तो सत्यप्रेमी को यहाँ उनका पक्ष रखते हुए यह जरूर बताना चाहिए था कि हिन्दीग़ज़ल में इन प्रमाणोंके साथ कहा जा सकता है कि हिंदी ग़ज़ल में कोई साम्प्रदायिक बू नहीं है और डॉ. वर्मा ने ऐसे किया है हिन्दी ग़ज़ल की सकारात्मक दृष्टि को कुंठित। इसके साथ ही वह यह बताते कि हिन्दी ग़ज़ल की सकारात्मक दृष्टि क्या है?     इन सब सवालों के जवाब न देकर, उन्होंने सीधे और सरल रास्ता इन सवालों से पलायन का अपनाते हुए डा. वर्मा की बात पाठकों या सुधीजनों की समक्ष न रखी। डॉ. राजेन्द्र कुमार के तथ्यों को ही सबके समक्ष रखने में अपनी वाहवाही समझी।
   डा. राजेन्द्र कुमार अपने लेख हिन्दी ग़ज़ल कहना ही होगामें तर्क देते हैं-‘‘ अगर कोई ग़ज़ल को अपनी निजी परम्परा और निजी प्रतीकात्मक व्यंजना के नाम पर उसमें गुलो-बुलबुल, शमा-परवाना को यथावत बनाये रखने का हिमायती हो तब तो बेशक हिन्दी ग़ज़ल इस बात की गुनहगार है कि उसने इस परम्परा से हटकर अपने प्रयोग किये हैं लेकिन यह कहना कि ग़ज़ल की असली शक्ति तो उसकी कल्पनाशीलता और प्रतीकात्मकता में है, उसे ही ग़ज़लों ने छोड़ दिया है, ठीक नहीं है। छोड़ा है तो काल्पनिकता को छोड़ा है, कल्पनाशीलता को नहीं। अफसोस है कि कुछ लोग काल्पनिकता और कल्पनाशीलता के अंतर को, एक के मुकाबल दूसरे की महत्ता को महसूस करने से कतराते हैं। इसीलिये उन्हें ग़ज़ल की मूल प्रवृत्ति पर आघात होता नजर आता है।’’
   अगर हम परम्परागत ग़ज़ल का ही विवेचन करें तो उसमें गुलो-बुलबुल, शमा-परवाना, साकी-शराब-मयखाना अपने अभिधात्मक, लक्षणात्मक, व्यंजनात्मक या प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत हुए हैं। इसके अतिरिक्त भाषायी-विस्तार न हुआ हो, ऐसा कहना, सोचना, समझना, परम्परागत ग़ज़ल की परम्परा पर आँख मूँदकर बयान देने के अलावा कुछ नहीं। परम्परागत ग़ज़ल में वह सबकुछ भाषायी स्तर पर मौजूद है, जिसकी दुहाई परम्परागत ग़ज़ल को खारिज कर हिन्दीग़ज़ल की स्थापना को लालायित आज हिन्दी ग़ज़ल के पुरोधा दे रहे हैं। साथ ही यह बात भी दावे के साथ नहीं कहीं जा सकती है कि हिन्दी ग़ज़ल शमा परवाना, साकी-शराब, मयखाना, गुलो-बुलबुल से मुक्त हो गयी है। यदि इनके स्थान पर फूल, तितली, शलभ-लौ, मदिरा, मदिरालय, मेंहदी, अधर , चुम्बन, यौवन आदि ने ग्रहण कर भी लिया है तो यह कोई बहादुरी का कार्य इसलिये नहीं है क्योंकि इससे परम्परागत ग़ज़ल की न तो परम्परा टूट गयी है और न हिन्दी ग़ज़ल ने नये प्रतिमान स्थापित कर लिये हैं। बल्कि इससे तो परम्परा को हर प्रकार विस्तार ही मिला है। इस विस्तार को यदि हिन्दी ग़ज़ल कहकर प्रचारित किया जायेगा तो सोचना यह पड़ेगा कि उर्दू ग़ज़ल [ जिसे खुद हिन्दी वाले उछाल रहे हैं, उर्दू वाले नहीं ] क्या है? भाषा वैज्ञानिक दृष्टि से तो उर्दू हिन्दी हैऐसे में हिन्दी-उर्दू का यह विवाद ग़ज़ल का विवाद न होकर भाषायी विवाद ज्यादा है। अगर भाषायी विवाद के आधार पर ही हमें विधाएँ या साहित्य को तय करना है, वह भी अवैज्ञानिक तरीके से, तो हम ऐसे आदरणीय विद्वानों से एक सवाल जरूर-यदि संज्ञा या संज्ञा विशेषणों मात्र के आधार पर ही कोई भाषा अपना भाषिक आधार खड़ा कर लेती है, भाषा के लिये यदि शब्दावली ही प्रमुख है तो हिन्दी में रेल, इन्जन, पिन, आलपिन, जंगल, टायर, ट्यूब, पंचर, बल्ब, होल्डर, साईकिल, स्टेशन आदि का विकल्प क्या है? ऐसे शब्दों का हिन्दी के सर्वनामों, क्रियाओं आदि के साथ बहुतायत से प्रयोग करने पर क्या ग़ज़ल हिन्दी की जगह अंग्रेजी ग़ज़लहो जायेगी?
बात आती है इन्हीं शब्दों के प्रतीकात्मक, व्यंजनात्मक प्रयोग के संदर्भ में तो डॉ. राजेन्द्र कुमार का यह कथन कि-‘‘ परम्परागत ग़ज़लें शमा-परवाना, गुलो-बुलबुल तक ही सीमित रही हैं और हिन्दी ग़ज़ल इस सीमा को तोड़कर बाहर खड़ी है?’’ यह धारणा ग़लत इसलिये है क्योंकि ग़ज़ल के इस प्रणयात्मक रूप का हिन्दी में आज भी प्रचलन खूब जोरों पर है। ज्यादा दूर न जायें तो इसका प्रमाण पंकज उदास, अनूप जलोटा जैसे ग़ज़ल-गायकों और सरिता, सुषमा आदि में छपने वाली गजलों तथा स्वयं प्रसंगवशका यह हिन्दी ग़ज़ल विशेषांक इसका प्रमाण है। यह तो डॉ. राजेन्द्र कुमार खुद स्वीकारते हैं कि ग़ज़ल की तरह हिन्दीग़ज़ल में भी प्रतीकात्मकता और कल्पनाशीलता के तत्व विद्यमान हैं, बस छोड़ा है तो काल्पनिकता को। प्रश्न यह है कि हिन्दी में जो ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, जब तक उनमें रूमानी संस्कार विद्यमान हैं, तब तक यह दावे के साथ कैसे कहा जा सकता है कि उसने काल्पनिकता से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया है?
   अगर यह मान भी लिया जाये कि ग़ज़ल हिन्दी में आकर अपने परम्परागत संस्कारों से कटकर गुलो-बुलबुल की दास्तान नहीं रही है। डॉ. सत्यप्रेमी के अनुसार अब इसमें अनास्था, निराशा, ऊब के साथ-साथ आक्रोश, विद्रोह और प्रतिकार के स्वर मुखर हो रहे हैं।’’
 डॉ. महावीर के मत से-‘‘इसका सम्बन्ध इश्क और व्यक्तिगत भावों में न होकर सामाजिक जीवन की विसंगतियों से है।’’
प्रो.वी.एल. आच्छा की नजर में-‘‘हिन्दी ग़ज़ल ने उस मुहावरे को पकड़ने की पहल की है, जिसके केन्द्र में समकालीन जीवन के दर्दीले परिदृश्य हैं।’’
 इन सब बातों का औचित्य तभी सिद्ध किया जा सकता है, जबकि मूल कृति और उसका चरित्र क्या है और परिवर्तन के बाद उस मूल कृति ने जो नया रूप या चरित्र ग्रहण किया है उसके अनुरूप उसका परम्परागत नाम या विशेषण उसे सार्थकता प्रदान करता है, अथवा नहीं? इस संदर्भ में अगर ग़ज़ल ने हिन्दी में आकर अपने परम्परावादी चरित्र को त्याग दिया है, वह साकी, प्रेयसी, नृत्यांगना [ कुल मिलाकर एक भोगविलासी औरत ] की जगह अब ऐसी औरत की भूमिका निभा रही है, जिसे हर प्रकार से राष्ट्रीय, सामाजिक, पारिवारिक दायित्वों का बोध है, तब प्रश्न यह है कि क्या हम उसे अब भी भोगविलासी औरतकहकर पुकारें या इस चरित्र के अनुरूप उसे कोई नया नाम दें? इसी केन्द्र बिन्दु से इसी केन्द्र बिन्दु तक सारी की सारी बहस शुरू की जानी चाहिये। बहस के इस बिन्दु पर आकर हिन्दी ग़ज़ल के प्रवर्तकों , उद्घोषकों, पक्षधरों की सारी की सारी चिन्तनप्रक्रिया को लकवा क्यों मार जाता है? हिन्दी ग़ज़ल का राग अलापने वाले जब तक इस तरह की बहस में शरीक नहीं होंगे, तब तक ग़ज़ल में न तो हिन्दी तय की जा सकेगी और न हिन्दी में ग़ज़ल।
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ-202001

मो.-9634551630  

हिंदी ग़ज़ल में होता है ऐसा ! +रमेशराज

  रमेशराज   
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हिंदी ग़ज़ल में होता है ऐसा !

+रमेशराज
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   ‘हिन्दी-ग़ज़लके अधिकांश समर्थक, प्रवर्त्तक , समीक्षक, लेखक और उद्घोषक मानते हैं कि -‘ग़ज़ल शब्द मूलतः अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है-‘नारी के सौन्दर्य का वर्णन तथा नारी से बातचीत।
नालंदा अद्यतन कोषमें ग़ज़ल का अर्थ-[ फारसी और उर्दू में ] शृंगार रस की कवितादिया गया है। लखनऊ हिन्दी संस्थान द्वारा प्रकाशित उर्दू हिन्दी शब्दकोषमें ग़ज़ल का अर्थ प्रेमिका से वार्तालाप है। यह तथ्य तुलसी प्रभाके अंक सित.-2000 में श्री विनोद कुमार उइके दीपने अपने लेख हिन्दी ग़ज़ल-एक अध्ययनमें स्वीकारे और उजागर किये हैं । हिन्दी ग़ज़ल विशेषांकके रूप में प्रकाशित उक्त पत्रिका के इसी अंक में डॉ. नीलम महतो का भी मानना है कि-‘ग़ज़ल शब्द का अर्थ सूत का तानाहै। जब यह शब्द स्त्रियों के लिए प्रयुक्त होता है तो स्त्रिायों से प्रेम-मोहब्बत की बातचीत हो जाता है। उनकी सुन्दरता की तारीफ करना हो जाता है।’’
   ग़ज़ल विधा के अनुभवी अध्येता चानन गोविन्दपुरी ग़ज़ल के उक्त रूप या चरित्र को यूँ परिभाषित करते हैं-‘‘ग़ज़ल वह सुन्दरी है, जिसे ढीली-ढाली पोशाक पसंद नहीं, उसे चुस्त लिबास ही भला लगता है। खूबसूरत सुन्दरी से मुराद, उसकी केवल मुख की सुन्दरता या शरीर की लम्बाई ही नहीं, जिस्म के सभी अंगों में एक आनुपातिक सुडौलता होनी चाहिए।’’
   इसी हिन्दी ग़ज़ल विशेषांक के सम्पादकीय में श्री प्रेमचन्द्र मंधान लिखते हैं कि-‘ग़ज़ल की बुनियाद हुस्न-इश्क पर आधारित होने के कारण उर्दू और हिन्दी की ग़ज़लों में प्रेमालाप की सम्भावनाएँ अनंत हैं।
   उक्त सारे प्रमाण और तथ्य, इस सत्य को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं कि ग़ज़ल का विधागत स्वरूप, कथ्य अर्थात् उसके आत्म या चरित्र के आधार पर तय किया गया। ठीक इसी प्रकार कथ्य या चरित्र के आधार पर, अन्य विधाओं या उपविधाओं जैसे क़लमा, मर्सिया, ख्याल, कसीदा, हज़्ल, व्यंग्य, भजन, वन्दना, प्रशस्ति, अभिनन्दन, मजाहिया, कहमुकरिया, पहेली आदि का भी निर्माण हुआ। इस कथ्य या चरित्र को प्रस्तुत करने में शरीर [ शिल्प ] की भूमिका सदैव गौण रही या रहती है। अर्थात् किसी भी निश्चित छंद की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं रही। उदाहरण के लिए ईश्वर के प्रति व्यक्त की जाने वाली भावना को भजन के रूप में-दोहा, रोला, कवित्त, सवैया, घनाक्षरी, चौपाई, सोरठा आदि अनेक छन्दों के माध्यम से व्यक्त किया जाता रहा है। ठीक इसी प्रकार की कथ्य सम्बन्धी विशेषताओं को लेकर कबीर के दोहों को साखी, सबद, रमैनी आदि कहा गया। बधाई, विनय, मंगलाचार, श्रद्धांजलि, पहेली, उलटबांसी, गारी, बन्ना, आरती, मल्हार, मान या कजैतिन के गीत आदि का भी जब हम शास्त्रीय विवेचन करते हैं तो ये विधाएँ या उपविधाएँ भी किसी शिल्प-विशेष या छन्द-विशेष के परिचय की मोहताज न होकर, हर प्रकार अपने कथ्य या चरित्र-विशेष को ही मुखरित करती हैं। यही चारित्रिक विशेषाताएँ इन विधाओं की स्पष्ट पहचान है।
   ठीक इसी प्रकार के चरित्र को लेकर ग़ज़ल की स्थापना प्रेमिका से प्रेमपूर्ण बातचीतके संदर्भ में की गयी। इसके लिए कोई छन्द-विशेष न पहले प्रधान था, न आज है। ग़ज़ल अनेक छन्दों अर्थात् बह्रों में कही जाती है। ग़ज़ल में प्रयुक्त अनेक छंदों [ बह्र ] में से प्रयुक्त कोई छन्दविशेष अपनी निश्चित तुक-व्यवस्था या निश्चित पद-व्यवस्था के अन्तर्गत एक विशेष प्रकार के कथ्य को आलोकित करता है। इसी कथ्य के आलोक के संदर्भ में ग़ज़ल का ग़ज़लपन तय किया जाता रहा है। अतः नालंदा शब्दकोषमें ग़ज़ल को शृंगार की कविता’, ‘.प्र. हिन्दी संस्थानकी पुस्तक हिन्दी-उर्दू शब्दकोशमें-‘प्रेमिका से वार्तालाप’, डॉ. नीलम महतो की दृष्टि में- ‘सूत का ताना, जो कि स्त्रियों के संदर्भ में आमोद-प्रमोद करना हैया चानन गोबिन्दपुरी की दृष्टि में-‘एक आनुपातिक सुडौलताके रूप में उभरता है तो ग़ज़ल की एक स्पष्ट और शास्त्रीय पहचान बनती हुई दिखाई देती है। ग़ज़ल का ग़ज़लपन तय होता हुआ परिलक्षित होता है। इसलिए प्रेमचंद मंधान का यह मानना कि-‘ग़ज़ल की बुनियाद हुस्न-इश्क पर आधारित है, अतः ग़ज़ल में प्रेमालाप की सम्भावनाएं अनंत हैं।मंधान यह कहकर ग़ज़ल के वास्तविक अर्थ और मूल स्वरूप की पकड़ करते हैं। उनकी इस बात में अजीब या अटपटा कुछ भी महसूस नहीं होता। लेकिन उनके द्वारा सम्पादित इसी अंक के आलेखों या कथित ग़ज़लों के स्वर जब इन्हीं तर्कों का उपहास करते हुए दिखाई देते हैं तो एक असारगर्भित,अशास्त्रीय अटपटानपन, प्रेत की तरह प्रकट होता है, जिसकी काली छाया में ग़ज़ल का स्वरूप, अर्थ और उसका ग़ज़लपन थर-थर काँपने लगता है।
   श्री विनोद कुमार उइके दीपके आलेख के अन्तर्गत डॉ. राही मासूम रजा की मान्यता है कि-‘ग़ज़ल केवल एक फार्म है और इस फार्म की शैली हिन्दुस्तान के सिवाय दुनिया में कहीं है ही नहीं। दो लाइनों पर आधारित यह फार्म दोहा है।
   डॉ. साहब ने यह बात सम्भवतः इस आधार पर कही होगी कि ग़ज़ल का हर शेर बजाते-खुद-मुक़म्मल और दूसरे शेरों से बेनियाज होता है।  फिर भी यहाँ विचाणीय तथ्य यह है कि-
1-अगर ग़ज़ल एक फार्म-भर है तो ग़ज़ल के चरित्र अर्थात् कथ्य सम्बन्धी पहलू पर नालंदाऔर .प्र. हिन्दी संस्थानके शब्दकोश क्यों जोर देते हुए ग़ज़ल को प्रेमिका से वार्तालापया शृंगार की कविताघोषित करने पर तुले हुए हैं?
2-ग़ज़ल का शेर यदि एक दोहा है तो फिर दोहा क्या है?
3- अगर यह मान भी लिया जाए कि ग़ज़ल में दो लाइनों पर आधारित यह फार्म दोहा ही है तो इसे शेर कहने, मानने, मनवाने का औचित्य?
4-डॉ. राही मासूम रजा के इस बयान को यदि हम दो पंक्तियों के माध्यम से कही गयी किसी सम्पूर्ण बातके संदर्भ में लें और शेर तथा दोहे की इसी मुकम्मल बयानीकी विशेषता के साम्य को दृष्टि में रखते हुए विचार करें तो क्या इसी अंक में प्रकाशित धरोहरके अन्तर्गत हरिश्चन्द्र रसाकी कथित ग़ज़ल [ जहाँ देखो वहाँ.. ] या कबीर की [ हमन है इश्क मस्ताना..] को ग़ज़ल की परिभाषाओं के अंतर्गत लाकर, इनका ग़ज़लपन तय कर सकते हैं? क्योंकि गौरतलब यह है कि ये रचनाएँ गीतात्मकता, कथ्य और भाव की एकरूपता को, सम्पूर्णता के साथ अपने में सँजोये हुए ही नहीं हैं, इनमें विनय और वन्दना के स्वर आदि से लेकर अन्त तक शृंखलाबद्ध तरीके से मौजूद हैं। अर्थात् ग़ज़ल के प्रत्येक शेर से दोहे जैसी कथन की सम्पूर्णता या मुकम्मलपन पूरी तरह गायब है। ग़ज़ल या हिन्दी ग़ज़ल के समर्थक ऐसी रचनाओं को ग़ज़ल या हिन्दी-ग़ज़ल की श्रेणी में रखकर अगर खुश होते हैं तो होते रहें, ये रचनाएँ विनय या वन्दनाएँ हैं।
अतः काँटे का सवाल यह भी है कि-आज शेर के कथ्य के मुकम्मलपन को दरकिनार कर रसाऔर कबीरकी  रचनाओं को ग़ज़ल के अन्तर्गत रखा गया है तो क्या भविष्य में रत्नाकरके उद्धव शतकको भी ग़ज़ल की श्रेणी में लाने का प्रयास होगा? क्योंकि उद्धव शतकके कवित्तों में भले ही शेर जैसा मुकम्मलपन मौजूद न हो, लेकिन रदीफ-काफियों को व्यवस्था ग़ज़ल की ही तरह मौजूद है।
   कथित ग़ज़ल की टाँग-पूँछ के ही दर्शन कर उसे ग़ज़ल कहने, मानने या मनवाने वालों से कुछ सवालों के उत्तर और पूछे जाने चाहिए कि यदि ग़ज़ल एक फार्म-भर है तो इस फार्म में कोई सरस्वती, लक्ष्मी या अन्य किसी देवी-देवता की वन्दना करे तो उसे वन्दनापुकारा जायेगा या ग़ज़ल? इसी शिल्प के अन्तर्गत कोई, गणेश, शिव, विष्णु, पार्वती आदि की आरती समाविष्ट करता है तो क्या आरतीके स्थान पर यह भी ग़ज़ल का एक नमूना बनेगा? ठीक इसी प्रकार के शिल्प में यदि कोई बधाई’, ‘गारी’, ‘बन्ना’, ‘कजैतिनया मानके गीतों को समाहित करता है तो क्या हम इन्हें उक्त विधाओं या उपविधाओं के स्थान पर ग़ज़ल कहकर ही संतुष्ट होंगे? क्या वे इसे भी ग़ज़ल की गौरवमय परम्परा का उत्कृष्ट नमूना बतायेंगे? ग़ज़ल के व्यामोह में फँसा हुआ ग़ज़ल-फोबिया का शिकार व्यक्ति ही, उक्त विधाओं के कथ्य या चरित्र को दरकिनार कर, इन्हें ग़ज़ल बतलाने का दुस्साहस अपने अन्दर पैदा कर सकता है।
   अस्तु! यह ग़ज़ल या हिन्दी ग़ज़ल पर बयानबाजी का दौर है। ग़ज़ल के समर्थक, उद्घोषक, इधर हिन्दी में कुछ ज्यादा ही उपज रहे हैं। जिन्हें ग़ज़ल लिखने या कहने का सलीका या तरीका नहीं आता, वे ग़ज़ल पर आलेख-दर आलेखों की भरमार कर रहे हैं। ग़ज़ल के शिल्प और कथ्य को बीमार कर रहे हैं।
   इसी विशेषांक में ग़ज़ल के विद्वान् लेखक अनिरुद्ध  सिन्हा अपने आलेख ग़ज़ल की समझ का विरोधके अन्तर्गत भले ही कितने भी असरदार या बज़्नदार तर्क देकर अपने तथ्यों को पाठकों के समक्ष रखते हों, लेकिन उनके इस लेख के साथ, इसी विशेषांक में पृ. 31 पर प्रकाशित, उनकी ही एक ग़ज़ल, उनकी समझ की पोलखोलकर रख देती है। श्री अनिरुद्ध सिन्हा की दूसरी ग़ज़लपाँच शेरों की है। इसमें प्रयुक्त छः काफ़ियों में से दो काफिये शामऔर कामतो ठीक हैं। बाकी काफिये नामकी बार-बार आवृत्ति के कारण काफिये के स्थान पर रदीफ की तरह प्रयुक्त हुए हैं, जो हर प्रकार अशुद्ध प्रयोगका ही परिचय देते हैं। रदीफ की तरह काफियों को प्रयोग करने की यह ग़ज़ल की समझ’, क्या ग़ज़ल के मूल स्त्रोतों पर आघात नहीं है?
   श्री विनोद कुमार उइके दीपअपने आलेख हिन्दी ग़ज़लः एक अध्ययनके अन्तर्गत इस बात को खुले मन से स्वीकारते हैं कि ग़ज़ल का हर शेर बजाते खुद मुकम्मल और दूसरे शेरों से बेनियाज होता है। लेकिन इस विशेषांक के पृ. 63 पर प्रकाशित उनकी प्रथम ग़ज़ल के समस्त शेर उनके इन्हीं तथ्यों पर उपहास की मुद्रा में खड़े हैं। यह ग़ज़ल, ग़ज़ल के नाम पर आइना--अदल’, ‘कँवल’, ‘असलहै या छलहै? यह कैसी ग़ज़ल है, जिसका प्रत्येक शेर एक दूसरे का पूरक है। ऐसी अशास्त्रीय ग़ज़लों को डॉ. नीलम महतो यह कहकर श्रेष्ठ रचना-धर्मिता का नूमना बताती हैं कि-‘‘ग़ज़ल-गीत नाम से आने वाली ग़ज़ल में भावगत अलगाव यह है कि यह अपनी बुनावट में तो ग़ज़ल ही हैं परंतु इनकी आत्मा गीत-सी है। ऐसी ग़ज़लों के शेर आपस में अनुस्यूत-से हैं, उनके पहले शेर के भावों की पुष्टि ग़ज़ल का दूसरा शेर करता है, जो नज्म का-सा रूप खींचता है। ठीक इसी प्रकार हिन्दी ग़ज़लगो शिवमंगल सिंह सुमनने अपनी एक ग़ज़ल मर्सिया शैलीमें कही है।’’
   डॉ. नीलम महतो ने उक्त बातें इसी विशेषांक में प्रकाशित अपने आलेख-‘ग़ज़ल का उत्स और हिन्दी ग़ज़ल में प्रयोग की दिशाएँके अन्तर्गत कही हैं। उनकी यह बातें कहाँ तक सही हैं, यहाँ भी सवालों की शृंखलाएँ उभर रही हैं-
1.क्या हिन्दी में ग़ज़ल के नाम पर ग़ज़ल के शास्त्रीय स्वरूप और उसके मूल स्त्रोतों को आघात देकर ही हिन्दी ग़ज़लकही जायेगी?
2.जैसा कि आजकल हिन्दी ग़ज़ल के समर्थक विभिन्न पत्रिकाओं के माध्यम से घोषणाएँ कर रहे हैं कि हिन्दी में आकर ग़ज़ल ने अपने परम्परागत स्वरूप [ शिल्प और कथ्य ] से मुक्ति पा ली है’, तो यहाँ सोचने का विषय यह है कि इनमें ग़ज़ल जैसा क्या रह गया है, जिसे ग़ज़लके नाम से विभूषित किया जाये? क्या ऐसे ग़ज़ल-मर्मज्ञों को ग़ज़ल की समझया जानकारी है भी या नहीं?
3.अगर ऐसे विद्वान् तेवरी को भी ग़ज़ल का ही एक रूप मानने या मनवाने पर तुले हैं तो ऐसे मनीषियों को क्या कहा जाये?
4.अगर हिन्दी में आकर ग़ज़ल, गीत के निकट जा सकती है, तो क्या भविष्य में गीत भी ग़ज़ल के निकट जाकर कोई नया गुल खिलायेगा, क्या वह भी हिन्दी ग़ज़ल हो जायेगा?
5.आज ग़ज़ल, गीत और मर्सिया शैली में लिखी गयी है तो क्या वह भविष्य में वन्दना, बधाई, भजन, कसीदा, कलमा, मल्हार, मंगलाचार, अभिनन्दन और वन्दन शैली में भी लिखी जायेगी?
6.जैसा कि डॉ. नीलम महतो ने अपने आलेख में लिखा है कि-‘डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, जहीर कुरैशी, आभा पूर्वे की अनेक ग़ज़लें दोहा-ग़ज़लनाम से प्रकाश में आयी हैं।तो क्या ग़ज़ल की बह्र की हत्या कर, भविष्य में ग़ज़ल हिंदी-छंदों के नाम के साथ-चौपाई ग़ज़ल, रोला ग़ज़ल, घनाक्षरी ग़ज़ल, गीतिका ग़ज़ल, हरिगीतिका ग़जल, सोरठा ग़ज़ल आदि-आदि नामों से जानी जायेगी? आभा पूर्वे की इसी अंक में प्रकाशित दोहा ग़ज़लों में मुखरित छन्द सम्बन्धी दोष भी क्या हिन्दी ग़ज़ल की कोई विशेषता बनकर उभरेगा?
   अस्तु, जब हिन्दी में आकर ग़ज़ल, अपने ग़ज़लपन, मूलस्त्रोतों, शास्त्रीयता अर्थात् समस्त प्रकार की विशेषताओं को खोकर हिन्दी ग़ज़लबनने का प्रयास कर रही है तो ऐसे में डॉ. कैलाश नाथ द्विवेदी तुलसीप्रभाके इसी विशेषांक में प्रकाशित अपने आलेख में हिन्दी कविता और ग़ज़लके अन्तर्गत, हिन्दी कविता में ग़ज़ल मिश्रित[ ग़ज़ल नहीं ] पंक्तियों के नमूने प्रस्तुत करने लगें और एक कवि बेढ़बके इसी तरीके से बने हुए ग़ज़ल के कथित हास्यास्पद रस को अमृत बताने लगें तो आश्चर्य कैसा? हिंदीग़ज़ल में होता है ऐसा!
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ-202001

मो.-9634551630  

Saturday, April 9, 2016

क्षमा करें तुफैलजी! + रमेशराज



  RAMESHRAJ
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क्षमा करें तुफैलजी!

[ ग़ज़ल-संग्रह चुभनकी समीक्षा के बहाने एक बहस ]


- रमेशराज
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      तुफैलजी हास्य-व्यंग्य के साथ-साथ ग़ज़ल की उत्तम नहीं सर्वोत्तम पत्रिका’ ‘लफ्ऱज़निकालते हैं। जाहिर है पत्रिका में प्रकाशित ग़ज़लें उत्तम नहीं, सर्वोत्तमहोंगी। ग़ज़ल-संग्रहों की आलोचना भी सर्वोत्तम ही होगी। सम्पादकीय के अन्तर्गत उनकी बात अर्थात् अपनी बातभी सर्वोत्तम न हो, ऐसा कैसे हो सकता है।
   तुफैलजी ने लफ्ज़के वर्ष-1 अंक-4 में अपने सर्वोत्तम सम्पादकीय में लिखा है-‘‘ग़ज़ल में उस्तादों को, परम्परा से ही मानक माना जाता है। मीर तकी मीर ने सिरहानेको सिरानेबाँधा और हम इसे ग़लत होते हुये भी स्वीकार करने को बाध्य हैं... हम उन्हीं के पढ़ाये-सिखाये या बिगाड़े और नासमारे लोग हैं।’’
   स्पष्ट है उस्तादों की परम्परा के तुफैलजी जैसे कायल या घायल लोग, उस्तादों की लीक से हटकर चलना नहीं चाहते। गलत परम्पराओं को बदलना नहीं चाहते। फिर भी उनके विचार उत्तम ही नहीं, सर्वोत्तम हैं, तो हैं। ग़ज़ल में इस तरह के पेचो-खम हैं, तो हैं।
   परम्परा की दुहाई देकर ग़ज़ल का कीमा कूटने वाले भले ही प्रेमपूर्ण बातचीत करती औरतके पेट से गाय की टाँग निकालने और टाँग का निचला भाग ऊँट के सर जैसा बनाने में माहिर हो गये हों [चुभनसंग्रह की समीक्षा लफ्ज़’, वर्ष-1, अंक-4 ] किन्तु हिन्दी में वे हिन्दी ग़ज़लकारों को ऐसा करने के खिलाफ यह हिदायत देते नजर आते हैं-‘‘आज भाषा काफी सँवर चुकी है। ये गोस्वामी तुलसीदासजी का काल नहीं कि एक ही क्रिया के लिये करहूं’, ‘करहीं’,‘ करिहों’, कुछ भी चल जाये।’’ [लफ्जवर्ष 1, अंक-4, पृ. 64 ]
   तुफैलजी का यह कैसा सर्वोत्तम आलोचना-कर्म है कि वे मीर की तहरीर से तो अपनी तकदीर सँवारते हैं, किन्तु तुलसीदास का अनुकरण करने वाले हिंदी ग़ज़लकारों को धिक्कारते हैं। क्या तुफैलजी इस सच्चाई से वाकिफ नहीं हैं कि अगर ये काल तुलसीदास का नहीं है तो मीर के ग़ज़ल-मानकों के रास का भी नहीं है।
   आचार्य भगवत दुवे के चुभनग़ज़ल संग्रह के बहाने इसी अंक में तुफैलजी का आलोचना-कर्म कितना सर्वोत्तम है, आइये इसे देखें-तुफैलजी की दृष्टि में, ‘‘पुस्तक चुभनबढ़ई द्वारा मिठाई बनाने की कोशिश है, जो लौकी पर रन्दा कर रहा है। आलू रम्पी से काट रहा है। मावे का हथौड़ी से बुरादा बना रहा है। पनीर को फैवीकॉल की जगह प्रयोग करने के बाद प्राप्त हुई सामग्री को 120 रु. में बेच सकने की कल्पना कर रहा है।’’
   तुफैलजी के इस सर्वोत्तम अलोचना-कर्म का हाल यह है कि उन्हें आचार्य भगवत दुवे की ग़ज़ल की दो पंक्तियों-‘‘ झेलना हम जानते हैं घाव अपने वक्ष पर, पीठ दुश्मन को कभी अपनी दिखायेंगे नहीं’’ में अश्लीलता नजर आती है। अश्लीलता उक्त पंक्तियों में है या तुफैलजी के मन में है? इस सवाल का उत्तर पाठकों या साहित्यकारों को उन्हें अवश्य देना चाहिए।
   ‘एक विचित्र किस्म का जीवंत जीवमानते हुये श्री श्याम सखा श्यामने मसि कागदके अगस्त-दिसम्बर-09 में तुफैलजी को 12 ग़ज़लों के साथ प्रस्तुत किया है। इस प्रस्तुति से पूर्व उन्होंने तुफैलजी के उस सर्वोत्तम व्यवहार का भी जिक्र किया है जो चाहे जब जूतमपैजार का आदी है। 
   ‘ग़ज़ल-सृजन, ग़ज़ल-आलोचना-कर्म और जूतमपैजारको किसी हथियार की तरह इस्तेमाल करने वाले तुफैलजी के इस सुकर्म को नमन् करते हुये, ग़ज़ल के क्षेत्र में उनकी परस्पर विरोधी बातों का हुक्का भरते हुये, या यूँ कहें कि उनसे डरते हुये एक पाठक [ क्योंकि उनकी दृष्टि में मैं कवि या लेखक हूँ ही नहीं ] की हैसियत से मसिकागदमें प्रकाशित उनकी ग़ज़लों का मूल्यांकन करने का अदना-सा प्रयास, इस आशा के साथ कर रहा हूँ कि वे मेरी इस धृष्टता  के लिये मुझे क्षमादान देंगे।
   मीर तकी मीर की परम्परा का पोषण करते हुये मीर को भी अपनी आलोचना के तीर से घायल करने वाले तुपफैलजी के बारे में सही राय क्या बनायी जाये, जो सर्वोत्तम हो, मेरी समझ से परे है। फिर भी उनकी यह सलाह तो साहित्यकारों को सर-माथे लेनी चाहिये कि-‘‘अपने परों पर किसी दूसरे का बोझ मत ढोइये, एक स्वतंत्र व सतत उड़ान भरिये।
   तुफैलजी ग़ज़ल के क्षेत्र में कैसी स्वतंत्र और सतत् उड़ान भर रहे हैं, आइए उसका अवलोकर करें-
तुफैलजी की मसि कागदमें प्रकाशित ग़ज़लों में अनेक ऐसे शेर हैं जो काबिले-दाद हैं। उनमें मार्मिक, तार्किक, ताजा और मौलिक कथन है। अनूठा बाँकपन है। ऐसे शेर कहने के अन्दाज आज कम ही मिलते हैं। किंतु ग़ज़ल संख्या 10 के मतला में समंदरकी तुक मुकद्दरसे मिलाने और अगले शेर में तरकाफिया लाने और बाद के शेरों में अंदर’, इसके बाद फिर समंदरऔर पत्थरतुकें निभाना अगर ग़ज़ल के क्षेत्र में स्वतंत्र और सतत् उड़ान भरना है तो ऐसी उड़ान पर अभिमान तुफैलजी कर सकते हैं। वे गुटरगूँ करते हुये ग़ज़ल के चाहे जिस दरबे में उतर सकते हैं। ग़ज़ल के मूलभूत नियमों के उल्लंघन को धीर-गम्भीर प्रयास बता सकते हैं। अगर यही कर्म कोई हिंदी ग़ज़लकार करे तो उसे गरिया सकते हैं।
   तुफैलजी का यह कहना कि-‘‘ ग़ज़लकार, ग़ज़ल के आचार्यों को ही नहीं, समकालीन श्रेष्ठ रचनाकारों को भी नहीं पढ़ते।’’ [ लफ्ज़ वर्ष-1 अंक-4 पृ. 64 ] इसलिये हास्यास्पद जान पड़ता है क्योंकि ग़ज़ल के महान विद्वान होने के बावजूद, तुफैलजी की ग़ज़लों में भारी खामियाँ शुतुरमुर्ग की तरह सर उठाती, दूसरों को उल्लू बनाती देखी जा सकती हैं। ग़ज़ल संख्या-11 में तुक डारभाषा के भौंडे खिलवाड़ को उजागर करती है।
   तुफैलजी कहते हैं- ‘‘रदीफ-काफिये निभाने के लिये हम भाषा के साथ मनमर्जी खिलवाड़ नहीं कर सकते... रचनाकार को भिन्न दिखाने के लिये-‘हाथी रेंकता है’, ‘कुत्ता चिंघाड़ता है’, ‘शेर भोंकता है’, ‘गधा दहाड़ता है’, नहीं लिख सकते हैं।’’
   क्षमा करें तुफैलजी! उपरोक्त ग़ज़ल की तत्सम या तद्भव तुकों गुजार’, ‘पार’, ‘दार’, ‘शिकार’, ‘हारऔर इसकी निकृष्ट तुक इश्तहारके बीच देशज शब्द की तुक डारका प्रयोग उसी रोग की ओर इंगित करता है, जिससे ग्रस्त होकर हाथी चिंघाड़ता नहीं रेंकता हैशेर दहाड़ता नहीं, भोंकता हैगधा रेंकता नहीं, दहाड़ता है। दूसरों के रचनाकर्म पर शर्म की कालिख पोतने से पहले तुफैलजी अपने गरेबान में झाँक लेते तो बेहतर होता।
   मेरा तुफैलजी के रचना-कर्म को लेकर कोई आग्रह या दुराग्रह नहीं है। मैं तो बस निवेदन करना चाहता हूँ कि काव्य के लिये किसी भी रचनाकार को दोमुँहे मापदण्ड नहीं बनाने चाहिए। काव्य के सृजन में देशज शब्द भी उतनी ही मिठास घोलते हैं, जितनी कि तत्सम या तद्भव। अतः विवाद भाषा में शब्द-प्रयोग को लेकर नहीं है। विवाद का विषय है- असंगत या भौंड़े शब्द-प्रयोग। इस स्थिति से हर रचनाकार को बचना चाहिये। इसी ग़ज़ल में शब्द नदीके स्थान पर नद्दीशब्द-प्रयोग भले ही ग्रामत्व दोषसे युक्त हो, लेकिन किनारे बैठकर ही नदी को पार कराने मेंइसकी व्यंजना शब्द-शक्ति प्रबल है। इसलिये यह प्रयोग खामी के बावजूद सफल है।
    “नींद सुविधा की रजाई में उन्हें आती नहीं|
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एक दूजे पर कभी जब वक्त की गर्दिश पड़े’,
फर्ज तब अपना निभाती हैं बहिन की राखियाँ |
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जंगलों का शहर हो गया,
आदमी जानवर हो गया |
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झूठ, मक्कारी, कलह, नफरत, दगाबाजी, घृणा,
हर तरफ ये भाईचारे के हमें माने मिले
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या इनमें अपनी ही बहिन-बेटियाँ सिसकती हैं,
किसी तवायपफ की टूटी हुई पायल पढ़ना|”
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आचार्य भगवत दुवे के ग़ज़ल-संग्रह चुभनकी समीक्षा करते हुये और इसी संग्रह की उपरोक्त पंक्तियों के उदाहरण देते हुए तुफैलजी भले ही इन मार्मिक पंक्तियों में सपाटबयानी, मात्रा-दोष, ग़ज़ल की मूल समझ का अभाव या कथ्य में घाव तलाशें, किन्तु तुफैलजी की ग़ज़लें भी दोषों से पाक-साफ हों, ऐसा कहना बेमानी होगा। सपाटबयानी का तीर चलाने वाले क्या मैया मेरी मैं नहिं माखन खायौजैसी सूर की विलक्षण पंक्ति पर सपाटबयानी का आरोप मढ़ सकते हैं? क्या कोई इस पंक्ति में व्यंजना, लक्षणा के प्रयोग कर इस पंक्ति के सपाटबयानी के दोष को दूर कर सकता है? गद्य को पद्य जैसी गरिमा सूरजैसा ही कोई कवि प्रदान कर सकता है। अतः यह कहना असंगत या अतार्किक नहीं होगा कि तुफैलजी ने चुभनसंग्रह को खारिज करने की गरज से ही खारिज करने की कोशिश की है। अगर ऐसा नहीं है तो वे मसिकागदमें प्रकाशित ग़ज़लों का पुनः अवलोकन करें, सोचें-विचारें, अपने भीतर के अहंकार को मारें तो उन्हें साफ-साफ पता लग जायेगा कि तारे सूर्य के आकार या उससे भी बड़े हैं। आग के विशाल गोले हैं। उन्हें तोड़कर लाया नहीं जा सकता। मुहावरे को छोड़ असल धरातल पर उनका शे-
बहुत मुमकिन है तारे तोड़ लाये,
पता कुछ भी नहीं है आदमी का|
अविज्ञानपरक, कोरी आतिशियोक्ति का जनक और एक ऐसा चकमक माना जायेगा जो आग नहीं, केवल निरर्थक ध्वनि उत्पन्न करेगा।
   खुदकुशी का पत्ता चलाकर, किसी टूटते रिश्ते को जोड़ने की प्रक्रिया अधोमुखी ही नहीं, मानसिक दबाव के लिये किये गये अप्रत्यक्ष बलात्कार की द्योतक है। अतः तुफैजली का किसी को यह सलाह देना -
[ वो रिश्ता तोड़ने के मूड में है,
मियां पत्ता चलो अब खुदकुशी का ]
बेबुनियाद ही नहीं, गलत है। धूर्त्तता और चालाकी से भरा कर्म है। गांधीवाद की कथित अहिंसा की कटार के प्रयोग भी जगजाहिर हैं। इनसे न किसी डायर का मन पसीजा और न कोई साइमन अत्याचार करने से चूका।
   नदी को बाँध् बनाकर उसे झील बनाने और उसके बल समाप्त करने से जल ठहर जायेगा, जो न तो खेतों की सिंचाई के काम आयेगा और न किसी प्यासे कंठ की प्यास बुझायेगा। झील में गिरते जल में जो ठहराव आयेगा, नदी का पानी बदबूदार हो जायेगा। अतः तुफैलजी के शे-
[ बनाके बाँध तुझे झील करके छोडूँगा,
जरा-सा ठहर नदी तेरे बल निकालता हूँ]
की समस्त क्रिया एक अधोमुखी चिन्तन का ही वमन बनकर रह जायेगी। किसी को दास बनाकर अत्याचार करने, अहंकार भरी हुंकार भरने से ही यदि ग़ज़ल सार्थकता ग्रहण करती है तो तुफैलजी को बधाई।
   तुफैलजी की सातवीं ग़ज़ल के दूसरे शे-
[ लौटेगी फिर देर से घर,
फिर बावेला होना है ]
में कर्त्ता कौन है, पत्नी, प्रेमिका या रखैल? शेर की मुक्कमलबयानी पर बट्टा लगाते उक्त शेर के माध्यम से आखिर वे क्या कहना चाहते हैं? क्या दफ्तर के            कामकाज से लौटी धर्मपत्नी को काव्य के पात्र के साथ कोई अन्य स्त्री हमबिस्तर मिलेगी, जिसे देखकर वह आग-बबूला हो जायेगी? या काव्य का पात्र दारू के नशे में धुत्त पड़ा होगा, जिसे वह आते ही फटकारेगी? अश्लीलता या अनैतिकता की पराकाष्ठा को ध्वनित करने वाला यह शेर किस कोण से सार्थक अभिव्यक्ति का नमूना है? क्या तुफैलजी को ऐसे ही अपने स्वाभिमान के परों पर स्वतंत्र और सतत उड़ाने भरते हुये ग़ज़ल के सबसे ऊँचे और सर्वोत्तम आकाश को छूना है?
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रमेशराज, 15/109, ईसानगर, अलीगढ-202001

मो.-9634551630